Thursday, November 1, 2018

आर्थिक न्याय तथा आर्थिक न्याय का अर्थ

आर्थिक न्याय

किसी भी समाज में पूर्ण रूप से अर्थ जारी हुए आर्थिक समानता गीता में गाना संभव नहीं है आरती माई का आरती समानता को समाप्त करना नहीं बल्कि कम करना है भारतीय मूल लक्ष्य आर्थिक असमानता को कम करना है समाज में व्यक्ति व्यक्ति की आय संपत्ति में कितनी भी सुनता नहीं होनी चाहिए जिससे सामाजिक विषमता उत्पन्न हो जाएं ऐतिहासिक रूप से सामाजिक न्याय व आर्थिक न्याय के तत्व पर हर युग में हर क्षेत्र मैं विद्यमान रहे मार्क्सवाद राजनीतिक चिंतक ने तो इतिहास कि वाक्य ही आर्थिक भौतिकवाद के सिद्धांत के आधार पर करते हुए लिखा है कि हर युग में आर्थिक स्थिति के कारण समाज में 2 वर्ग पाए जाते हैं जिनमें से 1 अमीरों का प्रतिनिधित्व करता है वही दूसरा गरीबों में शोषिता का उसने यह भी कहा है कि अमीर आमतौर पर गरीबों का शोषण करते हैं इस रूप में समाज में 2 वर्ग सशक्त व शोषित होने के कारण बिना एक वर्क की समाप्ति के समाज में आर्थिक न्याय की स्थापना ही नहीं की जा सकती विश्व के अन्य देशों की भांति भारत में भी लोगों की आर्थिक स्थिति एक जैसी नहीं है और इसलिए भारतीय न्याय की स्थापना भारतीय शासक का महत्वपूर्ण लक्ष्य भारत के विभिन्न राज्यों में बढ़ती हुई आर्थिक विषमता के कारण ही नक्सलवाद भ्रष्टाचार राजनीति के अपराधीकरण तस्करी वे आंतकवाद जैसी पर भर्तियां विकसित हुई है जो भारत की एकता और अखंडता के लिए बहुत बड़ी चुनौती है सामाजिक व राजनीतिक न्याय के लिए आर्थिक न्याय अनिवार्य शर्त है


आर्थिक न्याय का अर्थ

आर्थिक न्याय से तात्पर्य यह है धन संपत्ति के आधार पर व्यक्ति व्यक्ति के मध्य विभेद की दीवार खड़ी नहीं होनी चाहिए साधारण शब्दों में आर्थिक न्याय का अर्थ है आर्थिक क्षेत्र में न्याय मानव समाज में धन और संपत्ति का सदैव महत्वपूर्ण स्थान रहा है धन में संपत्ति समाज में उच्च दर्जा पाने में शक्ति प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है प्रति व्यक्ति धन और संपत्ति को बढ़ाने की चेष्टा करता है यदि किसी राज्य समाज में आर्थिक शक्ति स्रोतों का न्याय पूर्ण वितरण नहीं होता है तो उसे आर्थिक न्याय या आर्थिक समानता की संज्ञा दी जाती है प्रत्येक समाज में राज्य में आर्थिक संसाधनों में धन संपदा का न्याय पूर्ण वितरण ही आर्थिक न्याय जिससे समाज का प्रत्येक व्यक्ति गाड़ी में जीवन जी सकें दूसरे शब्दों में आरतियां सभी पारी है कि समाज में सभी व्यक्तियों की न्यूनतम आवश्यकताएं पूरी होनी चाहिए कोई इतना गरीब या आर्थिक रूप से दुर्बल हो जाए कि वह अपना अस्तित्व व गरिमा खो दें

पंडित जवाहरलाल नेहरू के शब्दों में भूख से मरे व्यक्ति के लिए लोकतंत्र का कोई अर्थ एवं महत्व नहीं है

डॉ राधाकृष्णन ने भी कहा है कि जो लोग गरीबी की ठोकरे खा कर इधर-उधर भटक रहे हैं जिन्हें कोई मजबूरी नहीं मिलती और जो भूख से मर रहे हैं वे संविधान या उसकी विधि पर गर्व नहीं कर सकते

अमेरिकी राष्ट्रपति एकलिंग डी रूजवेल्ट बिका है कि आर्थिक सुरक्षा एवं आर्थिक स्वतंत्रता के बिना कोई भी व्यक्ति सच्ची स्वतंत्रता प्राप्त नहीं कर सकता
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