Thursday, November 1, 2018

समानता का अधिकार

समानता का अधिकार

भारतीय संविधान में प्रत्येक नागरिक को कानून के समक्ष समानता राज्य में रोजगार के अवसरों की समानता एवं सामाजिक समानता प्रदान की गई है इस हेतु संविधान में  निम्न प्रावधान किए गए हैं

कानून के समक्ष समानता : अनुच्छेद 14 के तहत राज्य क्षेत्र में राज्य किसी भी व्यक्ति को कानून के समक्ष समानता या कानून के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा विधि के समक्ष सभी सम्मान है और बिना किसी विभेद के विधि के समान संरक्षण के हकदार हैं

धर्म मूल वंश जाति लिंग या जन्म स्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध : अनुच्छेद 15 राज्यों को यह आदेश देता है कि किसी नागरिक के साथ केवल उसके धर्म मूल वंश जाति लिंग या जन्म स्थान के आधार पर विभाग ने किया जावे सभी नागरिकों को दुकानों सार्वजनिक स्थलों तथा भोजन नाइयो होटलों मनोरंजन स्थलों वह तालाब स्नान करो सड़कों के प्रयोग का अधिकार प्रदान किया गया है इसी अनुच्छेद में स्त्रियों में बच्चों के साथ सामाजिक विषय क्षेत्र सिटी से पिछड़े हुए नागरिकों अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के नागरिकों के लिए विशेष प्रावधान का अधिकार दिया गया है

लोक नियोजन के विषय में अवसरों की समानता : अनुच्छेद 16 इस अनुच्छेद के तहत देश के सभी नागरिकों को राज्य के अधीन नौकरी में समान अवसर प्रदान करने की गारंटी दी गई है इस बारे में व्यक्ति के धर्म जाति लिंग या जन्म स्थान के आधार पर विभेद नहीं किया जावेगा किंतु राज्य को यह अधिकार है कि वह राजकीय सेवाओं के लिए आवश्यक योग्यताएं निर्धारित कर राज्य के मूल निवासी हेतु आरक्षण पिछड़ा वर्ग अनुसूचित जाति व जनजाति के लिए आरक्षण का प्रावधान कर दें यदि आप ध्यान से सोचें तो पाएंगे कि इस आरक्षण का उद्देश्य मूलते समानता की स्थापना ही है

अस्पृश्यता का अंत अनुच्छेद 17 : सामाजिक समानता बढ़ाने हेतु संविधान में अस्पृश्यता का पूर्ण निषेध किया गया है इसमें कहा गया है कि यदि ऐसा आचरण किया जावेगा तो दंडनीय अपराध माना जाएगा इस अनुच्छेद का उद्देश्य व्यक्ति को उसकी जाति के कारण ही स्पतियल माननीय जाने के मानवीय आचरण को समाप्त करना है इसे पूर्ण रूपेण समाप्त करने हेतु सरकार ने स्पष्ट या निवारण अधिनियम 1955 का संशोधन कर नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम 1955 कर दिया गया है अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति निरोधक अधिनियम 1990 पारित किया है यह कानून ए शरियत के अब तक बने कानूनों में सबसे अधिक कटोरे आते जरूरत इस बात की है कि इसका उपयोग अस्पृश्यता निवारण हेतु सदुपयोग के साथ ही यह सुनिश्चित किया जाए कि इसका दुरुपयोग न हो

उपाधियों का अंत अनुच्छेद 18 : ब्रिटिश शासन काल में संपत्ति विराज शक्ति के आधार पर उपाधियां प्रदान की जाती थी जो सामाजिक जीवन में भेद उत्पन्न करती थी संविधान में सेना तथा विद्या संबंधी उपाधियों के अतिरिक्त राज्य द्वारा किसी भी तरह की उपाधि दिया जाना निषेध है इसके अलावा भारत का नागरिक राष्ट्रपति की आज्ञा बिना विदेशी राज्य की कोई उपाधि स्वीकार नहीं करेगा
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