Saturday, November 3, 2018

भारत की विदेश नीति अतीत से सर्वप्रथम तक विश्व संबंधों के मामले में भारत की एक सूची परंपरा रही है

विश्व संबंधों के मामले में भारत की एक सुधीर की परंपरा रही है प्राचीन भारतीय वांग्मय में भारतीय समाज में संपूर्ण मानवता के समग्र विकास वह हितों की रक्षा व प्रकृति प्रदत्त वेदों को नकारते हुए विश्व परिवार की अवधारणा को इस प्रकार से स्वीकार किया है

अयं निज परो वेति गणना लघु चेतराम उदार चरिता ना तु वसुधैव कुटुंबकम इसके पीछे भारतीय समाज का यह मन मेरा है कि हितों की तरह आर्ट का रास्ता छोड़ सबके कल्याण वह सबके सुख का मार्ग अपनाई
सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे संतु निरामया सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्चित् सुख भाग्य बताएं
कालांतर में एनी सुरक्षित जीवन मूल्यों के मार्ग पर चले कर भगवान बुद्ध कुमारी सम्राट अशोक विवेकानंद आदि ने मानवता का प्रचार किया है अपनी स्वतंत्रता से लेकर आज तक भारत में सदैव अन्य देशों के साथ मित्रता के सेतु बांधने का प्रयास किया है जिसे पूरे विश्व में समर्थन भी मिला था स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भी विभिन्न मंचों से भारत ने अपनी प्राथमिकताओं और आदर्शों को है दोहराया है अंतरराष्ट्रीय मामलों पर भारत में प्रारंभ से ही अपने स्पष्ट विचार रखे हैं भारत में सदैव अन्य राष्ट्रों की स्वतंत्रता की अवधारणा तथा आत्म निर्णय के अधिकार का समर्थन किया है साथ ही सह अस्तित्व सबके हित के लिए बने राष्ट्रीय संगठनों को भारत में समर्थन प्रदान किया है भारत में साम्राज्यवाद के विरुद्ध अपने रुख को स्पष्ट किया है इस प्रकार एक राष्ट्र के रूप में स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व ही भारत ने अपनी विदेश नीति के उद्देश्य स्पष्ट कर दिया है

भारत की विदेश नीति में मैत्री एवं शांति एवं समानता के सिद्धांतों को सर्वाधिक महत्व दिया गया है भारत में सभी के साथ सहयोग एवं सद्भाव को रखते हुए शुद्र डांस स्पष्ट नीति के निरूपण किया भारत की विदेश नीति के आधार स्तंभ है शांति मित्रता और समानता
 विदेश नीति के शिशु में राष्ट्रीय हितों की पूर्ति सर्वाधिक महत्वपूर्ण तत्व होते हैं भारत में राष्ट्रीय तुमको अंतरराष्ट्रीय के साथ समायोजित करता रहा है हमारे मानवतावादी श्रेष्ठ आदर्श एवं स्वस्थ जीवन मूल्य विदेश नीति के गिरकानी आधार बन रहे हैं इसी सुसंस्कृत व्यक्ति ने भारत के विदेश नीति को हर काल में निरंतरता दी है भारतीय संविधान के अनुच्छेद में वर्णित राज्य के नीति निर्देशक तत्व के अंतर्गत भारतीय विदेश नीति के मूल्यों का समावेश किया जाता


 भारत की विदेश नीति के प्रमुख उद्देश्य निबंध अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा में शांति के लिए प्रयत्न करना अंतरराष्ट्रीय विवादों को मध्यस्थ आवारा सुलझाना सभी राज्यों में परामर्श समान पूर्ण संबंध बनाना अंतरराष्ट्रीय कानून व्यवस्था सैनिक समझो तो एक गुट बंदियों से अलग रहना उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद का विरोध रंगभेद का विरोध करना तथा अपनी स्वतंत्रता के लिए संघर्ष राष्ट्रों की सहायता प्रदान करना सभी देशों के साथ व्यापार और निवेश में उद्योगी सक्रिय अंतरराष्ट्रीय समुदाय के समक्ष आने वाली चुनौतियों के समाधान खोजने में सहयोग करना और अपनी स्थिति मजबूत करना
सन 1950 में स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत के समक्ष कुछ विशेष परिस्थितियों में चुनौतियां की अंतिम विदेश नीति के निर्धारण में इस महत्वपूर्ण स्थान रहा है स्वतंत्रता प्राप्ति के समय सूचना विरोध की राजनीति विकास की प्रार्थना की अपना आर्थिक व स्वर्गीय विकास करना भारत की पहली प्राथमिकता है इसके लिए उसे विश्व के सभी देशों के सहयोग की आवश्यकता थी इसी परिदृश्य स्नेह गुटनिरपेक्ष आंदोलन की नई अवधारणा की भूमिका तैयार की
अपनी पट्टी रक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ कर देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने की अत्यंत महत्वपूर्ण था भारत की विदेश नीति के निर्धारण में भौगोलिक तत्वों का महत्व परदेसी सुनता किसी भी राष्ट्र का प्रमुख होता है और भारत सोवियत संघ तथा साम्यवादी चीन जैसे तत्वों के समीप है दूसरी ओर दक्षिण पूर्वी तथा दक्षिण पश्चिमी इन से समुद्र से घिरा है अपनी सुरक्षा शांति रे मैत्री में ही भारत का हित है

भारत की विदेश नीति के निर्धारण में अपनी प्राचीन संस्कृति का प्रभाव रहा है विश्व बंधुत्व विश्व शांति में मानवतावाद आदि काल से ही हमारे प्रेरक मुझे रहे हैं स्वतंत्र संग्राम के तत्कालीन भारतीय नेतृत्व कर्ताओं के विचारों ने हमारी विदेश नीति को प्रभावित किया है
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