Thursday, November 1, 2018

मूल अधिकारों की आवश्यकता एवं महत्व

मूल अधिकारों की आवश्यकता एवं महत्व

प्रत्येक व्यक्ति को सुरक्षा प्रदान :मूल अधिकार लोकतंत्र की आधारशिला है इनके द्वारा प्रत्येक नागरिक को शारीरिक मानसिक में नैतिक विकास की सुरक्षा प्रदान की जाती है

शासन की स्वेच्छाचारिता पर रोक: कौटिल्य के अर्थशास्त्र में इस बात का उल्लेख है कि प्राचीन भारतीय राज्य व्यवस्था में सुविचार सारी संस्थाओं के लिए कोई स्थान में था भारतीय राज्यों की शक्ति पर एस्से प्रतिबंध लगाए गए थे कि वह सत्ता का दुरुपयोग में कर सकें संविधान में दिए मूल अधिकार शासन में विधानमंडल के ऊपर लगने में सहायता प्रदान करते हैं यह शासन के अधिकारों की शक्ति वे बहुमत दल की तानाशाही से नागरिकों को सुरक्षा देते हैं मूल अधिकार साधारण कानून से भी श्रेष्ठ है राज्य ऐसी कोई विधि नहीं बना सकता जो इन अधिकारों को छीन ली है या न्यून करती है

न्यायिक सुरक्षा : मूल अधिकारों का हनन होने की स्थिति में नागरिक न्यायालय की शरण ले सकता है

लोकतंत्र के आधार स्तंभ: मूल अधिकार लोकतंत्र के लिए आधार स्तंभ के भूमिका का निर्वहन करते हैं इनके अभाव में लोकतंत्र आत्मक शासन की कल्पना नहीं की जा सकती

समानता के कारक:  संविधान द्वारा राष्ट्र के समस्त नागरिकों को मूल अधिकार प्रदान कर उनमें परस्पर समानता स्थापित की गई है सभी विशेष अधिकारों को समाप्त कर दिया गया है नागरिकों के मूल अधिकार मानवी स्वतंत्रता के मापदंड और शिक्षक दोनों ही है इस कारण उनका अपना मनोवैज्ञानिक महत्व है वर्तमान युग का कोई राजनीतिक दार्शनिक उनकी अपेक्षा नहीं कर सकता

भारत के संविधान में मूल अधिकार

राष्ट्र की एकता व आम नागरिकों के हित के लिए किसी भी राज्य द्वारा अब तक बनाए गए मानव अधिकारों की जाटों में सर्वाधिक विस्तृत चार्टर संविधान के भाग 3 में शामिल है मूल अधिकारों के संबंध में संविधान में कुल अनुच्छेद है यह अनुच्छेद 12 से 30 से 32 से 35 तक दिए गए हैं इनमें भी कुछ अनुच्छेद असाधारण रूप से विस्तृत है विशेष रूप से 19 वर्ष अनुच्छेद में 450 शब्द होने से इसका आकार अत्यधिक व्यापक हो गया है

मौलिक अधिकार अधिकारों का एक स्वरुप है मौलिक अधिकारों का अर्थ स्पष्ट करते हुए भूतपूर्व मुख्य न्यायधीश के सुब्बाराव ने कहा था कि मौलिक अधिकार परंपरागत प्राकृतिक अधिकारों का दूसरा नाम है यह वह नैतिक अधिकार है जिन्हें हर काल में हर जगह हर मनुष्य को प्राप्त होना चाहिए क्योंकि अन्य प्राणियों के विपरीत में चेतन तथा नैतिक प्राणी है मानव व्यक्तित्व के विकास के लिए मौलिक अधिकार आवश्यक है ऐसे अधिकार है जो मनुष्य को श्वेता अनुसार जीवन व्यतीत करने का अवसर प्रदान करते हैं

भारतीय संविधान द्वारा भारतीय नागरिकों को साथ मूल अधिकार प्रदान किए गए थे किंतु 44 वें संविधान संशोधन द्वारा संपत्ति के अधिकार को मूल अधिकारों से विलोपित कर एक कानूनी अधिकार के रूप में ही सम्मिलित किया गया है इस तरह मूल अधिकारों को छह श्रेणियों के तहत गारंटी प्रदान की गई है
(1) समानता का अधिकार
(2) स्वतंत्रता का अधिकार
(3) शोषण के विरुद्ध अधिकार
(4) धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार
(5) संस्कृति तथा शिक्षा का अधिकार
(6) संवैधानिक उपचारों का अधिकार

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