Wednesday, October 31, 2018

जैसलमेर की राजकुमारी रत्नावती का शौर्य

जैसलमेर की राजकुमारी रत्नावती

जैसलमेर के राजा रतन सिंह की पुत्री रत्नावती ने अपने पिता को अलाउद्दीन के खिलाफ जंग लड़ने में सहायता प्रदान की और राजस्थान के इतिहास में अपना सुनहरा इतिहास लिखा

राजकुमारी ने हंसकर कहा: पिताजी दुख की चिंता नहीं कीजिए जब तक उसका एक भी पत्थर से पत्थर मिला है उसकी में रक्षा करूंगी चाहे अलाउद्दीन कितनी ही वीरता से हमारे दुख पर आक्रमण करें आप निर्भय होकर शत्रु से लोहा ले

यह जैसलमेर की दुर्गति पति महाराज रतन सिंह की कन्या थी इस समय बलिष्ठ अरबी घोड़े पर चढ़ी हुई थी और मरदानी पोशाक पहने थी उसकी कमर में दो तलवार लटक रही थी कमरबंद में गैस कब्ज पीठ पर तरकस और हाथ में धनुष था वह चल चल घोड़े की रास को बलपूर्वक खींच रही थी जो एक क्षण भी दिसती रहना नहीं चाहता था रतन सिंह जी से बेहतर पहने एक हाथी के फलौदी होने पर बैठे आक्रमण के लिए प्रस्थान कर रहे थे सामने उनके घोड़े इन हिला रहे थे और शस्त्र जन-जन आ रहे थे

रतन सिंह ने पुत्री के कंधे पर हाथ रख कर कहां बेटी तुझसे मुझे ऐसी ही आशा है विदुर को तुझे शॉप कर निश्चिंत हो रहा हूं देखना चाहता नैना सत्र खेल वीर्य नहीं द्रुत और छलिया भी हैं

मालिक का मे वक्र दृष्टि से पिता को देखा और हंस कर कहा नहीं पिताजी आप निश्चिंत होकर प्रस्थान करें किले का बाल भी बांका नहीं होगा

रतन सिंह ने दिव्य दृष्टि अपने किले के दूर से चमकते हुए अंगूरों पर डाली और हाथी बढ़ाया गगनभेदी जय निनाद से धरती आसमान कांप उठे एक विशालकाय अजगर की भांति सेना किले के फाटक से निकल कर पर्वत की उक्तियां में विलीन हो गई इसके बाद घोर चित्कार करके दुर्ग का फाटक बंद हो गया

इंडी दल की भक्ति शत्रु ने दुर्ग के रखा था सब प्रकार की रसद मार से आनी बनती प्रतिदिन यवन दल गोली और तीनों की वर्षा करता था जैसलमेर का दुर्ग वे से मस्तिष्क उठाएं खड़ा था यमन समझ गए थे कि दुर्ग विजय करना उचित नहीं है दुर्ग रक्षिणी राजनंदनी रत्नावती निर्भय अपने धर्म में सुरक्षित बेटी सत्रों के दांत खट्टे कर रही थी उसके साथ में पुराने विश्वस्त राजपूत वीर थे जो मृत्यु और जीवन का खेल समझते थे वह अपनी सखियों समय दुर्ग के किसी ब्रिज पर चढ़ जाती और यवन सेना का सट्टा उड़ आती हुई वहां से सन सुनाते हुए तीनों की वर्षा करती वे कहती मैं स्त्री हूं पर अबला नहीं मुझ में मर्दो जैसा सांसे और हिम्मत है मेरी सहेलियां भी देखने बरही की स्त्रियां है मैं इन पियानो को समझती क्या हूं

उसकी बातें सुनते ही लिया सट्टा कर हंस देती थी पर बल्ले मंडल दवारा अल क्रांति दुर्ग में बैठना राजकुमारी के लिए एक विनोद था

मालिक कफूर एक गुलाम था जो यवन सेना का अधिपति था वह दृढ़ता और शांति से राजकुमारी की छोटे से रहा था उसने सोचता था कि जब किले में खाद्य पदार्थ कम हो जाएंगे दुर्ग बस में आ जाएगा फिर भी वह समय-समय पर दूध पर आक्रमण कर देता था परंतु दुर्ग की चट्टानों और बाहरी दीवारों को कोई क्षति नहीं पहुंचती थी राजकुमारी बहुत दा ग्रुप पर कहती यह दूध खरीद एक गोली बरसा का मेरे को गंदा और मेला करें इसे क्या लाभ होगा

या 1 दिन में एक बार दुर्ग पर प्रबल आक्रमण किया राजकुमारी चुपचाप देखती रही जब शत्रु आदिल दूर तक दीवारों पर चढ़ आए तब भारी भारी पत्थर के डोके और गर्म तेल की ऐसी मार पड़ी कि सत्र सेना चीन चीन हो गई लोगों के मुंह में झुलस गए कितनों की चटनी बन गई हजारों यवन तोबा तोबा करके लेकर भागे जो पहुंचे उन्हें तलवार के घाट उतार दिया गया

सूर्य छिप रहा था पश्चिम दिशा लाल लाल हो रही थी राजकुमारी वहां चिंतित भाव से अति दूर पर्वत की रेखा में सूर्य को डूबते हुए देख रही थी उसे 4 दिन से पिता का संदेश नहीं मिला था मैं सोच रही थी कि इस समय पिता को क्या सहायता दी जा सकती है वह एक ब्रिज के नीचे बैठ गई धीरे-धीरे अंधकार बढ़ने लगा उसने देखा कि एक काली मूर्ति धीरे-धीरे पर्वत की तंग रायसेन किले की ओर अग्रसर हो रही है उसने समझा पिता का संदेश भाग होगा उसको कर उधर ही देखती रही उसे आश्चर्य तब हुआ जब उसने देखा कि वक्त दुआ वह जाकर सिंह द्वार की ओर जा रहा है तब अवश्य शत्रु है राजकुमारी ने एक का बाढ़ हाथ में लिया और चिपकी हुई उस मूर्ति के साथ ही दीवार की ओर के ऊपर आ गई

मूर्ति है गटरी को पीट से उतारकर प्राचीर पर चढ़ने का उपाय सोच रही थी राजकुमारी ने धनुष बाण चढ़ाकर ललकार कर कहा वही खड़ा रहे और अपना अभिप्राय कह

कॉल ग्रुप राजकुमारी को सम्मुख देख वे व्यक्ति बेबी स्वर में बोला मुझे किले में आने दीजिए बहुत जरूरी संदेश है

वह संदेश वहीं से कह

अतिशय गोपनीय है

कुछ चिंता नहीं कह

मैं किले में आकर कहूंगा

उसे प्रथम यह दिल तेरे कलेजे के पार हो जाएगा महाराज बीपी में है मैं उनका चरण

चिट्ठी हो तो फेंक दो जवानी कहना है जल्दी के यहां से नहीं कह सकता तब ले

राजकुमारी ने तीर छोड़ दिया वे उस के कलेजे को पार करता हुआ निकल गया राजकुमारी ने सिटी दे दो सैनिका हाजिर वेट कुमारी की आज्ञा पर रस्सी के सहारे उन्होंने नीचे जा मृत व्यक्ति को देखा मानता उसके एक व्यक्ति पीठ पर गठरी से बंधा था यह देख राजकुमारी जोर से हंस पड़ी उसके लिए वह प्रत्येक पर घूम घूमकर प्रबंध और पहले का निरीक्षण कर रही थी 4 फाटक पर जाकर देखा दवा रक्षक द्वार पर नेता कुमारी ने पुकार का यहां पर है और कौन है एक योद्धा ने आगे बढ़कर राजकुमारी को मुजरा किया उसने धीरे से राजकुमारी के कान में कुछ और भी का हंसते हंसते ऐसा ऐसा अवैध तुम्हें बाबा साहब

हां बेटी कुडाई योद्धा सनी हस दिया उसने घाट से सोने की पोटरी निकालकर का देखो इतना सोना है

 अच्छी बात है ठहरो हम उन्हें पागल बना दे बाबा साहब तुम आधी रात को उसकी इच्छा अनुसार दवार खोल देना रात भी हंसता और सिर हिलाता हुआ चला दे

12:00 बज गए थे चंद्रमा की चांदनी चौक रही थी कुछ आदमी दुर्ग की ओर छिपे छिपे आ रहे थे उनका सरदार मलिक काफूर था उनके पीछे से चुने हुए योद्धा थे संकेत पाते ही द्वारपाल ने प्रतिज्ञा पूरी की विशाल महल रडार फाटक खुल गया जो व्यक्ति चुपचाप दुर्ग में घुस गई मल्लिका पुणे मंदसौर में का यहां तक तो ठीक हुआ अब हमें उस गुप्त मार्ग से दूर के भीतर मेलों में पहुंचा दो जिसका तुमने वादा किया है राजपूत ने कहा मैं वादे का पक्का हूं मगर बाकी सोना तो दो

यह लो यह 1 सेनापति ने मुहर्रम की थैली हाथ में दर्द ए राजपूत पाठक का ताला बंद कर चुपचाप प्राचीर की छाया में चालाक लोमड़ी की भांति चक्कर खाकर कहीं गायब हो गया यह 1 सैनिक चक्रव्यूह में फंस गए ने पीछे का रास्ता मिलता ने आगे का व्यवस्था में कैद हो गए थे और अपनी मृत्यु पर पछता रहे थे मालिक कफूर दांत पीस रहा था राजकुमारी की शैलियां कितने चूहे की चूहे दानिया में फंसा कर हंस रही थी


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